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गौरल ईसरजी पधाऱ्या द्वार

कंचन मुरके , अमरावती 

गणगौर विशेष 


गणगौर एक हिंदू त्योहार है जिसे की ख़ास त्योहार से भारत के राजस्थान में मनाया जाता है और साथ ही साथ  राजस्थानी एवं माहेश्वरी महिलाए मनाती है। इस त्योहार में देवी पार्वतीजी की पूजा की जाती है. जो की वैवाहिक भक्ति और स्त्री शक्ति की  प्रतीक है।विवाहित महिलाएं अपने पति की सलामती के लिए व्रत रखती हैं और अनुष्ठान करती हैं। वहीं कन्याएं मन चाहा साथी पाने के लिए प्रार्थना करती हैं। गणगौर प्रेम एवं पारिवारिक का पावन पर्व है, गणगौर शब्द बना हुआ है दो शब्दों के मिलने से, गण और गौर। इसमें गण शब्द से आशय भगवान शंकर जी से है और गौर शब्द से आगय माँ पार्वती से है। माना जाता है की, गणगौर अपने पीहर आती है और फिर पीछे पीछे ईसर उसे वापस लेने आते है और आखिर में चैत्र शुक्ल द्वितीया व तृतीया को गणगौर को अपने ससुराल के लिए विदा किया जाता है। यह लोकप्रिय मेला हिंदू देवता गौरी माता के सम्मान में आयोजित किया जाता है। मान्यताओं के अनुसार प्राचीनकाल में माता पार्वती ने भगवान शिव को पती के रूप में पाने के लिए तपस्या, व्रत आदि किया था। भगवान शिव माता पार्वती की तपस्या से प्रसन हुए और माता पार्वती की मनोकामना । पूरी की। तभी से कुंवारी लड़‌कियां इच्छित वर पाने के लिए और सुहागने अपने सुहाग को लंबी उम्र के लिए ईसरजी और मां पार्वती की पूजा अर्चना करती हैं। गणगौर वाले दिन महिलाएं सज-धज कर सोलह श्रृंगार करती हैं और माता गौरी की विधि-विधान से पूजा करके उन्हें श्रृंगार की  सभी वस्तुएं अर्पित करती हैं। इस दिन मिट्टी से ईसर और गणगौर की मूर्ति बनाई जाती है और इन्हें बड़े ही सुंदर सजाया जाता है। गणगौर पर विशेष रूप में गेहू का आता और गुड के फल बनाए जाते हैं और गणगौर माता को भोग लगाया जाता है। शादी के बाद लड़की  पहली बार गणगौर अपने मायके में मनाती है। यह विवाह के प्रथम वर्ष में ही होता है. बाद में प्रतिवर्ष गणगौर लड़की अपनी ससुराल में ही मनाती है। ससुराल में भी वह गणगौर का उद्यापन करती है और अपनी सास को कपड़े तथा सुहाग का सारा सामान देती है। साथ ही सोलह सुहागिन स्त्रियो  को भोजन कराकर प्रत्येक को सम्पूर्ण श्रुंगार की वस्तुएं और दक्षिणा दी जाती है। दोपहर बाद गणगौर माता को ससुराल  विदा किया जाता है, यानि कि विसर्जित किया जाता है। विसर्जन कुए या  तालाब में किया जाता है। राजस्थान के जयपुर में देवी पार्वती को समर्पित गणगौर उत्सव बहुत धूम-धाम से मनाया जाता है। होली के दूसरे दिन में ही गणगौर का त्योहार आरंभ हो जाता है जो  पूरे 16 दिनों तक लगातार चलता रहता है। महिलाएं गणगौर पर्व के पहले दिन की सुबह  ही गाती- बजाती हुई होली की राख अपने घर ले  जाती है। मिट्टी गिली कर सोलह पिंडियां बनाती है। साथ ही दीवार पर सोलह बिंदियां कुमकुम की, सोलह बिंदिया मेहंदी की और सोलह बिंदिया काजल की प्रतिदिन लगाई जाती है। गणगौर का व्रत केवल सुहागिन स्त्रियां ही नहीं करती बल्कि कुवारी लड़‌कियां मनपसंद वर की कामना करते हुए इस व्रत और पूजा को  करती हैं। विवाहित महिलाएं अपने पति की दीर्घायु की कामना करती है | 

गणगौर पर्व के सभी दिन मां पार्वती की स्तुती  का सिलसिला चलता रहता है। अंतिम दिन भगवान शिव  की  प्रतिमा के साथ सुसज्जित  हाथियों, घोड़ों का जुलूस  और गणगौर की सवारी निकाली जाती है जो आकर्षण का केंद्र बन जाती ही हैं। राजस्थान पर्यटन विभाग के सौजन्य से हर वर्ष मनाए जाने वाले इस गणगौर उत्सव मे अनेक देशी-विदेशी पर्यटक  पहुंचते हैं। गणगौर पर्व का इतिहास भी बहुत पुराना है। पौराणिक कथा नुसार यह व्रत  माता पार्वती ने शिव के लिए किया था। चैत्र कृष्ण तीज को  गणगौर की प्रतिमा एक चौकी पर रख दी जाती है। यह प्रतिमा लकड़ी की बनी होती है, उसे जेवर और वस्त्र पहनाए जाते हैं।

उस प्रतिमा की सवारी या शोभायात्रा निकाली जाती  है। नाथद्वारा में सात दिन तक लगातार सवारी निकलती है। सवारी में भाग लेने वाले व्यक्तियों की पोशाक भी उस रंग की होती है जिस रंग की गणगौर की पोशाक होती है। सात दिन तक अलग-अलग रंग की पोशाक पहनी जाती हैं। माना जाता है कि राजघरानों में रानियों और राजकुमारियां प्रतिदिन गणगौर  की  पूजा करती थी। मट्टी को पिंडीयो  की पूजा कर दीवार पर गवरी के चित्र के नीचे सोली कुंकुम और काजल की बिंदिया लगाकर हरी दूर्वी से पूजती हैं। साथ ही इच्छा प्राप्ती के  गीत गाती हैं। शंकर-पार्वती के प्रेम की , दांपत्य जीवन की मधुर झलकीयो सुनाती है। शंकर और पार्वती को आदर्श दंपति माना गया है। दोनों के बीच के अटूट प्रेम के संबंध में एक कथा भी है जो गणगौर  के अवसर पर सुनी जाती  है।

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