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विवाहसंस्थेचा बदलता चेहरा: प्रगती की एकाकीपणाचा उंबरठा?


२०३० पर्यंत जगातील ४५% महिला राहतील अविवाहित; 'मॉर्गन स्टॅनली'चा धक्कादायक अहवाल 

दि. ११ मुंबई :- मॉर्गन स्टॅन्लीच्या एका अभ्यासाचा दाखला देत (ग्रामीण उदय न्यूज नेटवर्क , १ फेब्रुवारी २०२५), पुढील सहा वर्षांत जगातील सुमारे ४५% महिला अविवाहित राहण्याची शक्यता वर्तवण्यात आली आहे  करिअरला प्राधान्य, आर्थिक स्वावलंबन, स्वातंत्र्यप्रिय वृत्ती आणि कौटुंबिक बंधनांना प्रगतीतील अडथळा मानणे ही यामागील प्रमुख कारणे आहेत  या ट्रेंडमुळे पारंपरिक कुटुंब व्यवस्था कोलमडण्याची आणि लोकसंख्या घटण्याची भीती व्यक्त केली जात आहे  सामाजिक संतुलन राखण्यासाठी लग्नासाठी योग्य वयात (२३-२६ वर्षे) जागरूकतेची गरज अधोरेखित करण्यात आली आ.हे

आजच्या वेगवान युगात आपण एका अशा वळणावर उभे आहोत, जिथे 'कौटुंबिक स्थैर्य' आणि 'वैयक्तिक स्वातंत्र्य' यामध्ये मोठी दरी निर्माण होताना दिसत आहे. नुकत्याच समोर आलेल्या मॉर्गन स्टॅनलीच्या अहवालाने सामाजिक वर्तुळात एकच खळबळ उडवून दिली आहे. २०३० पर्यंत जगातील सुमारे ४५% महिला अविवाहित राहण्याची शक्यता वर्तवण्यात आली आहे. हा केवळ एक आकडा नसून, भविष्यातील बदलत्या सामाजिक रचनेचा एक गंभीर इशारा आहे.
बदलाची मुळे: शिक्षण आणि स्वावलंबन
एकेकाळी विवाह हा स्त्रियांसाठी सामाजिक आणि आर्थिक सुरक्षेचा एकमेव मार्ग मानला जात असे. मात्र, आज चित्र बदलले आहे. उच्च शिक्षण आणि करिअरमधील भरारीमुळे मुली आर्थिकदृष्ट्या स्वावलंबी झाल्या आहेत. जेव्हा एखादी व्यक्ती स्वतःचे निर्णय स्वतः घेण्यास समर्थ होते, तेव्हा ती 'तडजोड' करण्याऐवजी 'निवड' करण्याला प्राधान्य देते. ही निवड अनेकदा विवाहापेक्षा करिअर आणि वैयक्तिक प्रगतीकडे झुकलेली दिसते.
स्वातंत्र्य आणि जबाबदारीचा संघर्ष
आजच्या पिढीला 'स्वातंत्र्य' प्रिय आहे. विवाह आणि त्यानंतर येणारे मातृत्व किंवा कौटुंबिक जबाबदाऱ्या अनेकदा प्रगतीच्या आड येणारे अडथळे वाटू लागले आहेत. लग्नानंतर स्वतःची स्वप्ने बाजूला ठेवावी लागतील का? ही भीती अनेक मुलींना लग्नापासून दूर ठेवत आहे. याचा परिणाम असा होतोय की, अनेक सुशिक्षित आणि संपन्न घराण्यांतील मुली विवाहाचे प्रस्ताव सरळ नाकारत आहेत.
भविष्यातील धोक्याची घंटा
हा बदल सकृतदर्शनी 'प्रगती' वाटत असली तरी, त्याचे दूरगामी परिणाम चिंताजनक असू शकतात:
 पारंपरिक कुटुंब व्यवस्था ही समाजाचा पाया आहे. हा पाया डळमळीत झाला तर सामाजिक सुरक्षिततेचा प्रश्न निर्माण होईल.
लोकसंख्या घट: जपान आणि अनेक युरोपियन देशांप्रमाणेच भारतासमोरही भविष्यात जन्मदर कमी होण्याचे संकट उभे राहू शकते.
एकाकीपणाचा विळखा: तारुण्यात पद, पैसा आणि प्रसिद्धी आकर्षक वाटते. परंतु, आयुष्याच्या संध्याकाळी भावनिक आधारासाठी हक्काची माणसे नसणे, हे वृद्धापकाळातील एकाकीपणाला निमंत्रण देणारे ठरेल.
समतोल: काळाची गरज
प्रगती ही केवळ बँक बॅलन्स किंवा मोठ्या पदावर मोजली जाऊ नये. समाजाचे संतुलन राखण्यासाठी करिअर आणि कुटुंब यांचा समन्वय साधणे आवश्यक आहे. पालकांनी आणि समाजाने केवळ लग्नासाठी दबाव न आणता, लग्नानंतरही मुलींच्या स्वप्नांना कसे जपता येईल, याचे पोषक वातावरण निर्माण करणे गरजेचे आहे.
२३ ते २६ हे वय शारीरिक आणि मानसिकदृष्ट्या विवाहासाठी योग्य मानले जाते. या वयात योग्य जोडीदार मिळाल्यास आयुष्याची वाटचाल अधिक सुसह्य होते. प्रगती हवीच, पण ती प्रगती साजरी करण्यासाठी सोबत कोणीतरी असणे, हेच मानवी जीवनाचे खरे यश आहे.

आपल्याला अशा समाजाची निर्मिती करायची आहे जिथे मुलगी 'सक्षम' ही असेल आणि 'सुखी गृहिणी' ही असेल. वेळ निघून जाण्यापूर्वी आपण ही सामाजिक बदलाची लाट समजून घेऊन त्यावर सकारात्मक तोडगा काढणे आवश्यक आहे 

वेळ आहे सामाजिक जागृतीची

समाज अभ्यासकांच्या मते, २३ ते २६ हे वय विवाहासाठी शारीरिक आणि मानसिकदृष्ट्या अधिक संतुलित असते. मात्र, वाढत्या वयानुसार आवडीनिवडी बदलत गेल्याने आणि करिअरचा व्याप वाढल्याने योग्य जोडीदार मिळणे कठीण होत आहे. कौटुंबिक स्थैर्य आणि व्यक्तिगत प्रगती यांचा सुवर्णमध्य साधण्यासाठी सामूहिक स्तरावर जनजागृती करण्याची वेळ आता आली आहे, असे या अहवालाच्या निमित्ताने स्पष्ट होत आहे. 

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भविष्य की एक ज्वलंत समस्या
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👉🏿   जब बच्चों का विवाह
    20 साल में होता था, तो 
   एक सदी में 5 पीढ़ियाँ होती थीं.
👉🏿 जब बच्चों का विवाह
     25 साल में होता था, तो 
    एक सदी में 4 पीढ़ियाँ होती थीं.
👉🏿 अब बच्चों का विवाह
    30 साल में होता है, तो 
   एक सदी में 3 पीढ़ियाँ होती हैं.
👉🏿  सोचने वाली बात है.
        क्या हमारा समाज 
अगली सदी तक जीवित रहेगा ?
     आज एक अजीब सा 
       अंधेरा फैल रहा है.
🏚️    गली-मोहल्ले वीरान हैं, 
      आस-पास के घर खाली हैं.
आज घरों में बच्चों की आवाज कम 
        पति-पत्नी की आवाज 
         ज्यादा सुनाई देती है.
★  लड़कियाँ 30-35 साल तक 
              कुंवारी हैं.
★  लड़के 35 साल के बाद भी 
         कुँवारें घूम रहे हैं.
★  देर से शादी ...
   फिर सम्बंध विच्छेद (तलाक)
          टूटते परिवार  ...
         दुखी माँ-बाप.
      माता-पिता अकेले..
पूरी पीढ़ी खालीपन अनुभव करती है.
🤷🏻‍♀️   क्या हम इसे 
    "पढ़ा-लिखा समाज" कहें या 
"स्वयं को नुकसान पहुँचाने वाला समाज" 
💁🏻‍♂️  यह तो जनसंख्या कम करने की
           एक खामोश साज़िश है.
★ अगर 50 जोड़ों में 
      सिर्फ़ एक बच्चा हो
      तो अगली पीढ़ी में 
      सिर्फ़ नाममात्र के बच्चे होंगे.
👉  अगर ऐसा ही चलता रहा, 
        तो तीसरी पीढ़ी लगभग 
           गायब हो जाएगी.
👉 मोहल्ले,गलियाँ खाली पड़ी हैं.
         सब लोग रोड़ पर हैं.
        जीवन का आधा समय तो 
          रोड़ पर ही बीत जाता है.
★  गाँव के गाँव खत्म हो रहे हैं.
★ शहरों में ऊँची इमारतें हैं, लेकिन 
संयुक्त परिवार प्रथा समाप्त हो गयी है.
👉  नई बहुएं
    "सिर्फ़ एक ही बच्चा" चाहती हैं.
    🤷🏻‍♀️  क्या यही समाज है ?
❓ क्या यही हमारे पुरखों की 
             विरासत है ?
👉   सच तो यह है, कि ....
    बच्चे अब प्यार की निशानी नहीं रहे.
         बल्कि बच्चे पैदा करना ...
           एक मजबूरी सी है.
⚖️   सबसे बड़ी गलती — 
      लड़की के पिता की है,
        वही पिता जिसने 
     20-22 साल की उम्र में 
             विवाह करके 
          परिवार बसाया था.
अब वही पिता 30 साल की उम्र तक 
     अपनी बेटी का विवाह न करके 
           बहादुरी दिखा रहे हैं.
👉  परिणाम ????
लड़के लड़कियाँ डिप्रेशन में जा रहे हैं.
👉  आज बच्चों का सही समय पर 
          विवाह नहीं हो रहा है, और
               न सही समय पर 
           कोई नौकरी मिल रही है.
👉  समाज धीरे-धीरे 
      समाप्त होता जा रहा है.
👉   इसी कारण बच्चे 
       समाज के साथ नहीं
    अकेले रहना पसंद करते हैं.
         यानी एकल परिवार
  यहाँ तक कि बच्चे भी नहीं चाहिए.
★  देर से शादी करना
★  देर से बच्चा करना, फिर
         एक बच्चे के बाद 
   मेडिकल और लालन-पालन का
             बहाना करना.
💁🏻‍♀️  यह आम बात हो गई है.
हजारों जवान लड़के लड़कियाँ
    उम्र के कारण कुंवारे घूम रहे हैं.
      समाज के समझदार लोग 
          चुप्पी साधे हुए हैं.
★  विवाह, परिवार, बच्चे – 
इन सब को बोझ समझा जा रहा है.
🎈 विवाह ... कोई दुनियावी बंधन नहीं 
    यह घर परिवार और समाज का 
                स्तम्भ है.
🎈 प्रजाति, सभ्यता और संस्कार को
       आगे बढ़ाने का एक तरीका है.
💥 अब हम सब को समझने का 
         समय आ गया है.
        बच्चों को ‘हद से ज्यादा'
      आजादी दे कर हमने उनकी 
             समझ छीन ली.
★ विवाह टलता रहा, और जब हुआ,
      तब तक बहुत देर हो चुकी थी.
         फिर वही अकेलापन
         लड़के लड़कियों के लिए
        विवाह की सही उम्र
लड़कों के लिए 25 साल से पहले
 लड़कियों की  20 साल से पहले.
🚩 वर्ना इतिहास लिखेगा ...
  “वह हिंदू समाज, जिसने चुपचाप 
      स्वयं को खत्म कर लिया.” 
    सोचो और समझदारी दिखाओ.
     अपने बच्चों का विवाह
        समय पर कीजिये.🙏
क्योंकि ... परिवार नहीं बचा, तो 
         समाज को भी देर सवेर 
       ध्वस्त होते देर नहीं लगनी है.
यही कारण है ...डेविड सेलबॉर्न और 
        बिल वार्नर जैसे लेखक 
   यह कहने पर मजबूर हो जाते हैं , कि 
       ★   इस्लाम के मज़बूत 
      फैमिली सिस्टम की वजह से  ...
           देर सवेर ... अधिकांश देश
    ◆  इस्लाम से हार जायेंगे. ◆
 भारत में भी हिन्दू परिवार परम्परा का 
     पतन होना प्रारम्भ हो चुका है.
          रक्त के 5 रिश्ते
     समाप्त होने की कगार पर हैं.
       ताऊ, चाचा, बुआ, मामा
        मौसी जैसे रिश्ते
          आने वाले समय में
            देखने-सुनने को
            नहीं मिलने वाले हैं.
इसके लिए वह स्वयं उत्तरदायी है.
 हम जो हिन्दू एकता की बात करते हैं 
  ये तो सभ्यता ही समाप्त हो जाएगी.
       और इन सबके लिए हमारी
      वर्तमान पीढ़ी उत्तरदायी होगी.
    अगर आप इस विषय को
           गंभीर समझते हैं तो 
     इस समस्या पर विचार करें,
घर परिवार में, पति पत्नी के बीच,
       रिश्तेदारों में, दोस्तो में एवं 
     विभिन्न बैठकों एवं आयोजनों में 
          इस विषय पर मंत्रणा करें.
अपनी सभ्यता, संस्कार औऱ
            पीढ़ियों को बचाये.

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